केंद्र सरकार ने हाल ही में अधिवक्ता (संशोधन) विधेयक, 2025 का मसौदा प्रस्तुत किया, जिसका उद्देश्य अधिवक्ता अधिनियम, 1961 में संशोधन करना है। इस पहल का मुख्य उद्देश्य कानूनी पेशे को अधिक पारदर्शी, निष्पक्ष और सभी के लिए सुलभ बनाना है। हालांकि, इस मसौदा विधेयक के सार्वजनिक होने के बाद, देशभर के वकीलों और बार काउंसिलों ने इसमें प्रस्तावित प्रावधानों पर गंभीर आपत्तियाँ जताई हैं।

मसौदा विधेयक के प्रमुख प्रावधान

मसौदा विधेयक में “कानून स्नातक” और “कानूनी व्यवसायी” की परिभाषाओं में बदलाव प्रस्तावित किया गया है। इसके अनुसार, कानून स्नातक वह होगा जिसने तीन या पाँच वर्ष की अवधि का कोर्स पूरा कर स्नातक की डिग्री प्राप्त की हो। इसके अतिरिक्त, बार काउंसिल में केंद्र सरकार द्वारा तीन सदस्यों की नियुक्ति, अधिवक्ताओं द्वारा हड़ताल या न्यायालय बहिष्कार पर प्रतिबंध, और विदेशी लॉ फर्मों को भारत में वकालत करने की अनुमति जैसे प्रावधान शामिल हैं।

वकीलों और बार काउंसिलों की प्रतिक्रिया

इन प्रस्तावित संशोधनों के खिलाफ देशभर में वकीलों ने विरोध प्रदर्शन किए। मेरठ में अधिवक्ताओं ने केंद्र सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करते हुए अधिवक्ता संशोधन अधिनियम 2025 को वापस लेने की मांग की। उनका मानना है कि इस विधेयक से देश के 27 लाख अधिवक्ताओं के अधिकार प्रभावित होंगे।

हिलसा में भी अधिवक्ताओं ने बैठक आयोजित कर सरकार के प्रस्तावित संशोधनों पर नाराजगी व्यक्त की। उन्होंने कहा कि यह विधेयक अधिवक्ताओं की स्वतंत्रता और अधिकारों पर सीधा प्रहार है। प्रस्तावित प्रावधानों में बार काउंसिल में केंद्र सरकार का हस्तक्षेप, अधिवक्ताओं के विरोध करने पर प्रतिबंध, और विदेशी लॉ फर्मों को भारत में अनुमति देने जैसे मुद्दे शामिल हैं।

केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया

वकीलों और बार काउंसिलों के व्यापक विरोध को देखते हुए, केंद्र सरकार ने मसौदा विधेयक पर पुनर्विचार करने का निर्णय लिया है। कानून मंत्रालय ने घोषणा की है कि प्राप्त सुझावों और चिंताओं के आधार पर मसौदा विधेयक को संशोधित किया जाएगा। बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने सरकार के इस निर्णय का स्वागत किया है और इसे अधिवक्ताओं की जीत बताया है।

आगे की प्रक्रिया

कानून मंत्रालय ने मसौदा विधेयक पर सार्वजनिक परामर्श के लिए टिप्पणियाँ आमंत्रित की थीं, जिसकी अंतिम तिथि 28 फरवरी 2025 निर्धारित की गई थी। अब, प्राप्त फीडबैक के आधार पर, संशोधित मसौदा तैयार किया जाएगा और हितधारकों के साथ परामर्श किया जाएगा। इस प्रक्रिया का उद्देश्य एक ऐसा विधेयक तैयार करना है जो कानूनी पेशे की वर्तमान चुनौतियों का समाधान करे और सभी पक्षों के हितों की रक्षा करे।

निष्कर्ष

अधिवक्ता (संशोधन) विधेयक, 2025 के मसौदे ने देशभर में व्यापक चर्चा और बहस को जन्म दिया है। वकीलों और बार काउंसिलों की आपत्तियों को ध्यान में रखते हुए, केंद्र सरकार का पुनर्विचार का निर्णय स्वागत योग्य है। आशा है कि संशोधित विधेयक कानूनी पेशे की गरिमा और स्वतंत्रता को बनाए रखते हुए, न्याय प्रणाली को और अधिक सुदृढ़ करेगा।

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